
आज दिनांक 28 अक्टूबर 2009 के दैनिक हरिभूमि में पढि़ए। पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक करिए।
बुधवार, २८ अक्तूबर २००९
हरिभूमि में सरकारी कर्मचारी का किफायतनामा (अविनाश वाचस्पति)
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अविनाश वाचस्पति
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Wednesday, October 28, 2009
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लेबल: अविनाश वाचस्पति, सरकारी किफायतनामा, हरिभूमि
शुक्रवार, २३ अक्तूबर २००९
जनसत्ता में मन्ना डे को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्रदान करती हुईं महामहिम राष्ट्रपति

माननीय मन्ना डे को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित करती हुईं महामहिम राष्ट्रपति और समाचार।
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अविनाश वाचस्पति
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Friday, October 23, 2009
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शनिवार, १७ अक्तूबर २००९
हिन्दी ब्लॉग जगत की निराली दीवाली है : पोस्टें हैं दीप और टिप्पणियां लडि़यां और चर्चा फुलझडि़यां हैं (अविनाश वाचस्पति)

किसी की भी पोस्ट पर पसंद चटकाना
माउस से है पसंदीदा दीपावली मनाना ।
जरा न कतराना पसंद का चटका लगाना
पोस्ट पढ़ना और टिप्पणी करना पढ़ाना।
मंगलमय हो दीपावली सबकी ब्लॉगिंग की जी
इस ब्लॉगिंग की दीपावली को स्वर्णिम बनाना।
न पटाखे जलाना, न बम फोडना , राकेट छोड़ना
बने बनाये प्रदूषणकारी ढर्रे को अवश्य तोड़ना।
इतिहास बना रहे हैं आज, बजे अनोखा सुख साज
पोस्ट और टिप्पणियों से दीपावली सजी है आज।
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अविनाश वाचस्पति
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Saturday, October 17, 2009
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लेबल: अविनाश वाचस्पति
रविवार, ११ अक्तूबर २००९
छपासडॉटकाम पर गाय रेस (अविनाश वाचस्पति)

गाय पर अभी तक बचपन में कक्षाओं में निबंध लिखे जाते थे जिसमें उसका नख शिख वर्णन किया जाता था परंतु अब विषय बदलकर गाय के शहर से बाहर किए जाने के कारणों पर प्रकाश डालने के लिए विद्यार्थियों से कहा जाया करेगा। वैसे आपकी क्या राय है दिल्ली में कार रहनी चाहिए या गाय ? जल्दी बतलायें कहीं देर न हो जाये और गाय का शहर में होना अतीत की स्टोरी बन जाये। इससे पहले का पढ़ने और राय देने के लिए क्लिक करें
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अविनाश वाचस्पति
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Sunday, October 11, 2009
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लेबल: गाय रेस
शुक्रवार, ९ अक्तूबर २००९
कॉमनवेल्थ गेम्स : जाम कैसे मिलेगा ? (अविनाश वाचस्पति)
कल जब इसकी तैयारियों का जायजा लिया जाना था तो सड़कों से जाम गायब था। आप यह न समझें कि शराब पर रोक लगाने के बावजूद खुलेआम फेडरेशन टीम को जाम परोसे जा रहे थे बल्कि जो जाम था उनके रास्ते में नहीं, बल्कि दिल्ली के अन्य हिस्सों में लगता रहा। इससे आपको क्या लगता है कि वक्त से पहले की बात तो सोचिये ही मत, खेलों के खेलने से पहले सभी तैयारियां पूरी हो जायेंगी। नहीं होंगी तो भी कर दी जायेंगी और इस जबरदस्ती करने से ही तो कभी सड़के धसक जाती हैं, कभी लोहे के गार्डर कूद पड़ते हैं, कहीं मेट्रोमार्ग खुदकुशी कर लेता है तो कहीं कहीं पिलरों में हार्ट अटैक के माफिक दरारें देखी जा सकती हैं। पिलर अटैक का इससे ज्वलंत मिसाल और कहां मिलेगी, आखिर यह दिल्ली है दिलवालों की।
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अविनाश वाचस्पति
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Friday, October 09, 2009
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लेबल: कॉमनवेल्थ गेम्स
सोमवार, ५ अक्तूबर २००९
मोल तोल पर सरकारी कर्मचारी का किफायतनामा
अभी सरकारी खर्चे में किफायत बरतने के सरकारी निर्देश जारी किए गए देर नहीं हुई है कि एक अजब सा आदेश सरकारी कर्मचारियों के सिर पर मंडराने लगा है। खुफिया और विश्वस्त कई बार खुफिया होते हैं और कई बार सिर्फ विश्वस्त लेकिन इस बार करेला और वो भी नीम चढ़ा, तो सूत्रों से पता चला है कि सरकारी कर्मचारियों पर एक आदेश की गाज अब गिरी कि तब गिरी। अब आप यह मत कहने लगना कि एक गाजर के गिरने से क्या तूफान आने वाला है। पर भाई मैं गाजर की नहीं गाज की बात कर रहा हूं जबकि गाजर से हल्का दिखलाई देने वाले इस शब्द में गजब के कयामती तेवर छिपे हुए हैं। गाजर गिरने से सरकारी कर्मचारियों की तो छोडि़ए आम आदमी का भी सिर्फ यही नुकसान होगा कि वो गाजर के हलवे से वंचित रह जाएगा इससे अधिक नुकसान तभी होगा जब सिर्फ एक गाजर न गिरकर पूरी गाड़ी भर गाजर किसी पर गिर पड़ेगी तो उसका बचाव तो गाजर भगवान भी नहीं कर सकता है।
तो किस्सा कोताह यह है कि सरकारी कर्मचारी अब अपने लंच यानी दोपहर के भोजन में किफायत बरतें। अब सब जानते हैं कि सरकारी कर्मचारी नाश्ता तो घर से ही करके चलते हैं चाहे वे 11 बजे ही क्यों न चलें और डिनर घर पर ही करते हैं चाहे 3 बजे ही घर के लिए आफिस से क्यों न वापिस निकल पड़ें। बहुत सारे खुशकिस्मत तो शाम की चाय का समोसे, पकौड़े के साथ लुत्फ भी घर पर ही लेते हैं। बस यही एक कमी है हम लोगों में कि दूसरे की खुशी पूरा पढ़ने के और टिप्पणी के लिए मुझे माउस से किस करायें
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अविनाश वाचस्पति
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Monday, October 05, 2009
लेबल: अविनाश वाचस्पति
शुक्रवार, २ अक्तूबर २००९
द व्यूजपेपर हिन्दी अंतर्जाल पर : गांधीजी और मोबाइल फोन
द व्यूजपेपर हिन्दी
एक हिन्दी अंतर्जाल स्थल
यहां पर आप बेहतर पायेंगे
अपनी उपस्थिति दर्ज करें
गांधीजी और मोबाइल फोन
इसे पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया भी दर्ज कर सकते हैं
सभी हिन्दी प्रेमियों का स्वागत है।
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अविनाश वाचस्पति
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Friday, October 02, 2009
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लेबल: अविनाश वाचस्पति, गांधी जी, द व्यूजपेपर, मोबाइल




